Gatagat

प्यारी गटागट,

तुम्हारा नाम लेते ही पंसारी की दुकान में रखी वो काँच की बरनी आँखों के आगे तैर जाती है जिसमें वो तुम्हें सजाकर रखता था. आसपास श्वेत नमक का ढेर और बीच में श्यामवर्णा तुम, और तुम्हें ललचाई नज़रों से तकते हम…मन में दुआ करते हुए कि भगवान, सौदे में से १०, सिर्फ १० पैसे बच जाएँ, और हम तुम्हें खरीद पाएँ.

और गटागट की तरह ही खट्टी-मीठी ज़िन्दगी रचने वाले भगवान, अक्सर मेहरबान हो जाया करते थे.

१० पैसों में ४ गटागट का वो कीमती ख़ज़ाना लेकर, दुकान की पेढ़ी से नीचे उतरकर, पहला काम होता था मुँह में घुमड़ रहे पानी को सरेंडर कर, गटागट को सीधे उसके हवाले कर देना.

और उसके बाद के दिव्य अनुभव को तो शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता!

Mmmmm…..नमक, शक्कर, जीरा, इमली, आँवला, अमचूर, चूरन और जड़ी-बूटियों का वो मिश्रण किसी दूसरे ही लोक में ले चलता था, वो खट्टा-मीठा स्वाद ज़ुबान पर घुलकर सीधे दिल में उतर जाया करता था. और इसके पहले कि भाई-बहन या कोई दोस्त टपक पड़े और अपना हिस्सा माँग ले, एक के बाद एक सारी गटागट, फ़टाफ़ट अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचा दी जाती.

गटागट शायद इकलौती ऐसी गोली/चॉकलेट होगी जिसे बड़े-बुजुर्गों का भी आशीर्वाद प्राप्त था. अपचन है, गटागट खा ले बेटा…सफ़र में जी घबरा रहा है, गटागट मुँह में डाल ले छोटी… बीमारी से जीभ का स्वाद खराब हो गया, गटागट है ना…हम सभी ने कभी न कभी इसने हेल्थ बेनिफिट्स का अनुभव किया ही होगा.

कई बार सोचता हूँ कि ये गोली हमारे बचपन जैसी ही थी, अलग-अलग स्वादों वाली, थोड़े में ही ज्यादा आनंद वाली.

अब न वैसी दुकानें रहीं, न पंसारी, काँच की बर्नियाँ प्लास्टिक की हो गईं, गटागट भी कुछ ही जगहों पर सिमट गई. कहते हैं आजकल के बच्चों को सारी खुशियाँ सुलभ हैं. पर कभी-कभी सोचता हूँ, चमकदार रैपर के दीवाने और ४०-५० रुपयों में दो गोलेनुमा चीज़ें खाकर खुश होने वाले आजकल के बच्चे, कितना कुछ मिस कर रहे हैं न! आखिर जिसने अपनी देसी कैंडी, गटागट का मज़ा नहीं लिया…उसने क्या किया. तो क्या ख़याल है दोस्तों…आज फ़िर कहीं से ढूंढ लाई जाए अपनी वो बचपन वाली गटागट?

Images courtesy,

Shopify, TheBetterIndia, google, milksnack, mouthfreshner

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5 Comments

  1. Bachpan ki yaadein taza ho gayi…. Khatti meethi chatpati gatagat…. Hmmm yummy muh mai paani aa gaya…

  2. You know going back even further, I can remember the churanwala, who used to come to our street with a wooden box that had many compartments and which he set up on an hourglass shaped bamboo stand. For the princely sun of 5p, he would give us a choice of four flavours – just a half spoon of each and we would stand around salivating, waiting to grab the small square of paper and put the tangy, spicy and sweet churan pinch by pinch on to our tongues. I can still taste it, more than half a century later.

    Today of course we get so many of these gatagat type globules in the supermarkets. Psst….I taste every one of them, and finally buy one small sachet of anardana goli 😀

    1. My tongue started to salivate as I read your comment. Though I got to enjoy this princely dish only once or twice, they had kind of become extinct when I was growing up, but the way the churan reigned over on my tongue, it is still fresh in my mind.

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