प्यारी लोरी,
तुम्हारे नाम में ही कितना सुकून, कितना प्यार घुला हुआ है, आखिर तुम्हारा रिश्ता सीधे माँ से जो जुड़ा हुआ है.
बचपन की बात तो सबको याद है न! दिन भर उधम करके, सबकी नाक में दम करके, जब रात में माँ की गोद में सर रखते तो ऐसा लगता जैसे दुनिया की सबसे आरामदायक जगह पर पहुँच गए हों…जहाँ कोई डर नहीं, चिंता नहीं, सिर्फ प्यार है.
बालों में लाड से हाथ फिराती, हलकी-हलकी थपकियों से हमें सुलाती माँ, और चेहरे पर शरारती हँसी लिए सोने का नाटक करते हम…क्या कोई भूल सकता है वो क्षण!
हम सोने को तैयार नहीं, दिन भर चूल्हे-चौके में लगी माँ उसी क्षण तो हमें पूरी मिल पाती थी, ये क्षण हम खोने क्यों दें? माँ की चिंता दूसरी है, वो चाहती है कि हम जल्दी सोएं, आखिर सुबह स्कूल के लिए जल्दी भी तो उठना है. ये नटखट खेल बहुत देर तक चलता था. और फिर माँ अपनी नाज़ुक आवाज़ में लोरी गाना शुरू करती थी…
मक्खन-मलाई जैसी वो लोरियां. सीधे-सच्चे शब्द, भोली-भाली धुन, और माँ की शहद जैसी आवाज़, ये तीनों ऊँगली थामकर हमें नींद के गाँव की ओर ले चलते.
लल्ला-लल्ला लोरी…चंदा मामा दूर के…रे मामा रे मामा रे…लकड़ी की काठी…नन्हीं कली सोने चली, सूरज है तू, मेरा चंदा है तू…एक से बढ़कर एक गीत जो एक ऐसी मासूम दुनिया की बात कहते जिसमें दूध-बताशों की मिठास होती, उड़न खटोले में सैर होती, कच्चे-पक्के सौदे होते, घोड़ों तक को ठण्ड लग जाती, हवाएं भी अपने हिसाब से बहतीं…
गाने की रिदम पर हिलते-झूलते, झूलते-हिलते हम पता नहीं कब सपनों की दुनिया में जा पहुँचते. फिर धीरे से माँ हमारा सर नर्म तकिये पर रख देती और प्यार से माथा चूम लेती…नींद में भी वो ममता का स्पर्श महसूस होता था.
आज भी मन उन कानों में रस घोलने वाली लोरियों को और ममता के उन अद्भुत पलों को तरसता है…क्योंकि चाहे कितने भी बड़े हो जाएं, मन के अन्दर एक छोटा बच्चा अवश्य मौजूद रहता है.
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